Sunday, 22 December 2024

 मोहब्बत की कहानी लगती हो 



तुम गैर के बाहों में समाई हुई,

कभी-कभी अपनी सी लगती हो।

जमींदोज हुए लफ़्ज़ों की मानिंद,

मोहब्बत की कहानी लगती हो।



करके मोहब्बत तुमसे मैंने,

दरिया-ए-इश्क़ को पार किया।

डूब कर जब पार होता हूँ,

समसायों सी दूर लगती हो,

मोहब्बत की कहानी लगती हो।



दिन तो बीत जाते मेरे,

रातें तो भारी लगती हैं।

तशहीर का खिलौना बनना नहीं,

तुम मदारी ही तो लगती हो,

मोहब्बत की कहानी लगती हो।



आरिज़ की लाली लबों का मुस्काना,

फनकारों की फनकार तुम्हें माना।

पलकें तुम्हारी झुकती जब,

हूरों की हूर तुम लगती हो,

मोहब्बत की कहानी लगती हो।



अपने गुलशन की रानी तुम,

माली भी न मुझे दिया बनने।

कुछ कलियाँ चुनने की ख्वाहिश,

तुम ज़ालिम बेग़म लगती हो,

मोहब्बत की कहानी लगती हो।


सुखवीर सिंह


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