स्याह रात के धब्बे
काली स्याह रात के सफ़ेद पर्दे,
उन सफ़ेद पर्दों पर रंगीन इमारतें,
रंगीन इमारतों के नीचे झाँकती आंखो से,
कुछ अनकहा टपकता हुआ.........
करिश्माई रात के दूसरे किनारे पर,
सिसकती झोपड़ी में खूंखार बियावान,
तड़पकर ऊपर झाँकती बेबस आँखों में,
पुनः कुछ अनकहा उतराता हुआ.........
तीसरा पहर सब सन्नाटे में फैला,
कुत्तों की भौं-भौं में किकियाते साए,
कुछ कदम सकुचाते बेजान आँखों से,
पुनः कुछ अनकहा सम्हलता हुआ.........
पौ फूटने की हया में लिपटा हुआ,
नज़र सकुचाते पग डगमग-डगमग,
भेड़िए की चमक आँखों में अलसाई हुई,
पुनः कुछ अनकहा टटोलता हुआ...........