Thursday, 22 April 2021

मुलाक़ात

            मुलाक़ात 


सोचता हूँ कि मैं क्या हो गया हूँ 

देखता हूँ कि मैं क्या हो गया हूँ?

चले आओ मेरे हमसफ़र 

तुम्हारे बिना जी लगता नहीं।



एक अरसा बीत गया ख़ुद से मिले हुए

सोचता हूँ ख़ुद के लिए निकालूँ कुछ समय।

लेकिन अब ख़ुद के साथ ही

कहाँ समायोजित हो पाता हूँ?

मेरे हमसफ़र



हर दिन दुनियावी थपेड़े

मुझे गिराने को तैयार रहते हैं।

डटकर खड़ा हो जाता हूँ

कई बार पीछे भी हो जाता हूँ।

मेरे हमसफ़र



मंज़िल कभी नज़दीक तो कभी दूर 

फिसल कर उछलने की तासीर से 

काटकर  मेरे प्रयासों के जाल को

खेलती है मेरे साथ रोज़ एक खेल।

मेरे हमसफ़र



ख़ुद के साथ है मुलाक़ात अब ज़रूरी

कुछ गुफ्तगू अब करना है ज़रूरी।

चले जाओ मेरे  हमसफ़र

तुम्हारे बिना जी लगता नहीं।



सुखवीर सिंह