Tuesday, 28 January 2025

                                               स्याह रात के धब्बे 

                        

                                             काली स्याह रात के सफ़ेद पर्दे, 

                                             उन सफ़ेद पर्दों पर रंगीन इमारतें,

                                        रंगीन इमारतों के नीचे झाँकती आंखो से,

                                        कुछ अनकहा टपकता हुआ.........


                                        करिश्माई रात के दूसरे किनारे पर,

                                        सिसकती झोपड़ी में खूंखार बियावान,

                                        तड़पकर ऊपर झाँकती बेबस आँखों में,

                                        पुनः कुछ अनकहा उतराता हुआ.........


                                        तीसरा पहर सब सन्नाटे में फैला,

                                        कुत्तों की भौं-भौं में किकियाते साए,

                                        कुछ कदम सकुचाते बेजान आँखों से,

                                        पुनः कुछ अनकहा सम्हलता हुआ.........


                                             पौ फूटने की हया में लिपटा हुआ,

                                        नज़र सकुचाते पग डगमग-डगमग,

                                        भेड़िए की चमक आँखों में अलसाई हुई,

                                        पुनः कुछ अनकहा टटोलता हुआ...........

                                              

                                         

                                   

Sunday, 22 December 2024

  प्रथम किरण 


सूर्य की प्रथम किरण 

हृदय अंतःस्थल की ओर,

आलोकित करने को उद्यत 

तिमिरपूरित पोर-पोर,

है क्षमता उस किरण की 

मन आनंदित होने की ओर,

सुनाई दिया वह कंपन

विद्युत झंकृत 

चपला चंचल चहुँ ओर,

मन प्रसन्न हुआ जो था

अंधेरे के मानिंद खामोश,

जागी एक आशा जब 

पहुँची किरण हृदय छोर,

मन आलोकित-तन आलोकित 

पश्चात-पग-मध्याह्न-छोर। 


सुखवीर सिंह 

 

        तुम 


ख़ुद को बहकने से 

रोक नहीं पाता हूँ, 

दीदार जब तुम्हारा हो 

होश नहीं रख पाता हूँ। 


रास्तों पर चलते ही 

तुम्हारा ख़्याल आता है,

मिल जाओ गर तुम 

स्थिर नहीं रह पाता हूँ,

ख़ुद को बहकने से 

रोक नहीं पाता हूँ। 


परिचय क्या है तुम्हारा 

कभी जान ना पाया,

मिलती मगर जब तुम 

पूछ भी नहीं पाता हूँ,

ख़ुद को बहकने से 

रोक नहीं पाता हूँ।


गुफ्तगू की संभावना नहीं 

साथ कोई और तुम्हारे,

रोकता हूँ ख़ुद को 

संभल नहीं पाता हूँ,

ख़ुद को बहकने से 

रोक नहीं पाता हूँ।


तुम्हारे ज़ुल्फों की खुशबू 

तुम्हारे लबों की लाली, औ

हसीन आँखों में डूबने से 

रोक नहीं पाता हूँ,

ख़ुद को बहकने से 

रोक नहीं पाता हूँ।


एक और दीदार को 

दिन-दिन गिन रहा हूँ, 

शायद मिल भी जाओ तुम 

हिलोरें संभाल नहीं पाता हूँ,

ख़ुद को बहकने से 

रोक नहीं पाता हूँ।


ख़ुद को बहकने से 

रोक नहीं पाता हूँ, 

दीदार जब तुम्हारा हो 

होश नहीं रख पाता हूँ।


सुखवीर सिंह 




         दौर 


एक दौर ऐसा आ गया,

कुछ मामला ऐसा हुआ।

बात कुछ बन रही,

वातावरण कुछ बदल रहा।


गिले-शिकवे भूल जाना,

प्यार कुछ जता जाना।

तड़प कर एक बार,

फिर गले से लग जाना।


अंधेरी रात है काली,

सुबह की लाली दूर अभी।

हवा का झोंका ज़हरीला अभी,

समय की नाव जर्जर अभी।


दीपक जला लो तुम अभी,

थोड़ी साँस भर लो तुम अभी।

उम्मीद का फुहारा बरसेगा,

सुबह होगी ज़रूर अभी।


रास्ते की तलाश करते अभी,

बहुत सी निगाहें उठती अभी।

दौर आएगा बदलते करवट,

कौन कहाँ थका है अभी?


सुखवीर सिंह 

 मोहब्बत की कहानी लगती हो 



तुम गैर के बाहों में समाई हुई,

कभी-कभी अपनी सी लगती हो।

जमींदोज हुए लफ़्ज़ों की मानिंद,

मोहब्बत की कहानी लगती हो।



करके मोहब्बत तुमसे मैंने,

दरिया-ए-इश्क़ को पार किया।

डूब कर जब पार होता हूँ,

समसायों सी दूर लगती हो,

मोहब्बत की कहानी लगती हो।



दिन तो बीत जाते मेरे,

रातें तो भारी लगती हैं।

तशहीर का खिलौना बनना नहीं,

तुम मदारी ही तो लगती हो,

मोहब्बत की कहानी लगती हो।



आरिज़ की लाली लबों का मुस्काना,

फनकारों की फनकार तुम्हें माना।

पलकें तुम्हारी झुकती जब,

हूरों की हूर तुम लगती हो,

मोहब्बत की कहानी लगती हो।



अपने गुलशन की रानी तुम,

माली भी न मुझे दिया बनने।

कुछ कलियाँ चुनने की ख्वाहिश,

तुम ज़ालिम बेग़म लगती हो,

मोहब्बत की कहानी लगती हो।


सुखवीर सिंह


Thursday, 22 April 2021

मुलाक़ात

            मुलाक़ात 


सोचता हूँ कि मैं क्या हो गया हूँ 

देखता हूँ कि मैं क्या हो गया हूँ?

चले आओ मेरे हमसफ़र 

तुम्हारे बिना जी लगता नहीं।



एक अरसा बीत गया ख़ुद से मिले हुए

सोचता हूँ ख़ुद के लिए निकालूँ कुछ समय।

लेकिन अब ख़ुद के साथ ही

कहाँ समायोजित हो पाता हूँ?

मेरे हमसफ़र



हर दिन दुनियावी थपेड़े

मुझे गिराने को तैयार रहते हैं।

डटकर खड़ा हो जाता हूँ

कई बार पीछे भी हो जाता हूँ।

मेरे हमसफ़र



मंज़िल कभी नज़दीक तो कभी दूर 

फिसल कर उछलने की तासीर से 

काटकर  मेरे प्रयासों के जाल को

खेलती है मेरे साथ रोज़ एक खेल।

मेरे हमसफ़र



ख़ुद के साथ है मुलाक़ात अब ज़रूरी

कुछ गुफ्तगू अब करना है ज़रूरी।

चले जाओ मेरे  हमसफ़र

तुम्हारे बिना जी लगता नहीं।



सुखवीर सिंह 


Tuesday, 16 May 2017

एक बच्चा

ट्राई साइकिल पर

परेशान एक बच्चा

खड़ा ऐसी जगह पर कि

आगे न बढ़ पाए वो बच्चा

गिरा, उठा

फिर से वो बच्चा

किया साइकिल को पीछे

और चल पड़ा वो बच्चा