मेरी ख़ामोश निग़ाहों की बेबस आरज़ू,
पूरी ना हो सके ऐसी अलहदा जुस्तजू।
दर-ओ-दीवार ज़माने से पूछता भटकता,
अलहदा दुनिया से मेरे आलम की जुस्तजू।
रूहानी आशिक़ों ने कहा ये क्या करता है तू,
अपने महबूब की नहीं कर ख़ुदा की जुस्तजू।
किसी ख़ुदा की रहनुमाई का करू मैं क्या,
मुझे तो केवल है अपनी रूह की जुस्तजू।
ऐसी राहों पर न जा मेरी ए हमसफ़र,
कहीं वो न छीन लें मुझसे तेरी जुस्तजू।
शब्दार्थ:
1.जुस्तजू =खोज ,तलाश
2.अलहदा =अलग ,जुदा
पूरी ना हो सके ऐसी अलहदा जुस्तजू।
दर-ओ-दीवार ज़माने से पूछता भटकता,
अलहदा दुनिया से मेरे आलम की जुस्तजू।
रूहानी आशिक़ों ने कहा ये क्या करता है तू,
अपने महबूब की नहीं कर ख़ुदा की जुस्तजू।
किसी ख़ुदा की रहनुमाई का करू मैं क्या,
मुझे तो केवल है अपनी रूह की जुस्तजू।
ऐसी राहों पर न जा मेरी ए हमसफ़र,
कहीं वो न छीन लें मुझसे तेरी जुस्तजू।
शब्दार्थ:
1.जुस्तजू =खोज ,तलाश
2.अलहदा =अलग ,जुदा
put in some easy words so that we can also understand fully. By the way the"tukbandi" and "kafiya" are beautifull... keep it up!!!
ReplyDeleteनिर्मल जी !
Deleteआपके हौसलाआफजाई के लिए शुक्रिया ...
मैंने आप की सुविधा के लिए इसी ग़ज़ल में कुछ शब्दों के अर्थ लिख दिए हैं ...
shukruiyan bhai jaan...ap ne sahi kaha ki justjoo ka sadiq hona hi jaroori hai
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